नीतीश के तिकड़मी राजनीति का तिलिस्म तोड़ पाएंगे कुशवाह ?
पटना: देश में जब-जब चुनाव होते हैं, नेताओं में भगदड़ जरूर मचती है। इस दल या गठबंधन से उस दल या गठबंधन में आने-जाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। काफी हद तक यह चुनाव में टिकट बंटवारे तक चलता है। चुनाव बाद भी इधर-उधर की आवाजाही होती है, लेकिन तब यह ज्यादातर सौदेबाजी के रूप में सामने आती है। पद और पैसा इसके पीछे होता है। सौदेबाजी तो टिकट बंटवारे के वक्त भी होती है, लेकिन तब पैसा-पद का कोई मायने नहीं रहता।
उपेंद्र कुशवाहा (Upendra Kushwaha) ने 2019 में एनडीए का साथ छोड़ा था, तो इसके पीछे टिकट की सौदेबाजी थी। वह बीजेपी से लोकसभा की ज्यादा सीटें मांग रहे थे, लेकिन बीजेपी 2 से 3 सीटें ही देना चाहती थी। ताव खाकर वह अलग हो गये थे। चुनाव बाद उन्हें बीजेपी से सौदेबाजी का मौका इसलिए नहीं मिला कि उनकी पार्टी तो हारी ही, खुद अपनी सीट भी वह नहीं बचा पाये थे।
