चेक बाउंस: न डरें, न हल्के में लें; जानिए जेल का डर कितना सच और धारा 138 में क्या है सजा और कब होती है सख्ती?
चेक बाउंस होना नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के तहत एक अर्ध-आपराधिक अपराध है। यानी मामला तो पैसों के लेनदेन का है, लेकिन इसे अपराध की श्रेणी में इसलिए रखा गया है ताकि लोग चेक देने में अनुशासन बरतें। चेक बाउंस होने पर जेल जाना बहुत दुर्लभ है। अदालतों का प्राथमिक उद्देश्य आपको जेल भेजना नहीं, बल्कि जिसका पैसा है उसे उसका हक दिलाना है। अगर आप आदतन डिफॉल्टर हैं, जानबूझकर भुगतान से बच रहे हैं या स्टॉप पेमेंट जैसे हथकंडे अपना रहे हैं तो कोर्ट सख्त हो सकता है। वैसे तो दो साल तक की जेल और चेक की राशि से दोगुना जुर्माना हो सकता है, लेकिन ज्यादातर मामले आपसी समझौते पर खत्म हो जाते हैं। चेक बाउंस होने के बाद जब आपको कानूनी नोटिस मिलता है, तो वहां से 15 दिनों की समय सीमा शुरू होती है।
चूक न करें : कई लोग इसे सिर्फ डराने का तरीका मानते हैं और चुप बैठ जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह आपकी सबसे बड़ी गलती है।
व्हाट्सएप भी है गवाह : व्हाट्सएप पर की गई बातें भी कोर्ट में आपके खिलाफ सबूत बन सकती हैं। अगर इन 15 दिनों में पेमेंट हो गया, तो केस फाइल ही नहीं होगा।
CIBIL पर पड़ेगा असर
चेक बाउंस का सबसे पहला असर आपकी क्रेडिट रेटिंग पर पड़ता है। अगर बाउंस हुआ चेक किसी लोन की EMI का है, तो आपका सिबिल स्कोर तुरंत गिर जाएगा। भविष्य में लोन मिलना पहाड़ चढ़ने जैसा मुश्किल होगा। बैंक हर बाउंस पर 500 से 1,000 रुपये तक की पेनल्टी लगाते हैं और बार-बार ऐसा होने पर आपकी चेक बुक सुविधा भी छीनी जा सकती है।
