दिल्ली की एक फैमिली कोर्ट, सुबह के दस बज रहे
दिल्ली की एक फैमिली कोर्ट, सुबह के दस बज रहे हैं। बेंच पर एक महिला बैठी है- उम्र 28-29 साल, हाथ में फाइल, उसकी आंखों में न आंसू, न घबराहट। बस एक शांत, मुश्किल फैसला। महज तीन साल पहले इसी लड़की की शादी बड़े धूमधाम से हुई थी। लेकिन आज वो यहां है, एक ऐसे फैसले के साथ, जो उसने अकेले लिया, चुपचाप लिया और जिसे वो सही मानती है। ये कोई एक कहानी नहीं है।
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि भारत में दो दशक पहले जहां 0.6% विवाहित महिलाएं तलाकशुदा या अलग थीं, अब ये करीब 1% हो गई हैं। पुणे स्टडी 1986-87 के अनुसार, तलाक के 849 केस में 570 (67%) पतियों ने शुरू किए थे, पर अब करीब 58% महिलाएं पहल कर रही हैं।
कौन ले रहा? औसतन 31 वर्ष की महिलाएं और 36 के पुरुष
– तलाकशुदा महिलाओं और पुरुषों का कोई एकीकृत सरकारी राष्ट्रीय डेटा नहीं है। मगर, प्राइवेट मार्केट रिसर्च कंपनियों की स्टडी कहती है- देश में तलाक की औसत आयु महिलाओं में 31, पुुरुषों में 36 है।
