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खास खबरछत्तीसगढ़

श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ नगपुरा चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला: जैसा आप देखते हैं वैसा आपका विचार बनाता हैं- मुनि प्रशमरति विजय (देवर्धि साहेब)

दक्षिणापथ,नगपुरा/दुर्ग। ” जिससे नुकसान हो रहा है, वह प्रमाद है। हममे बहुत कुछ प्रवृत्ति ऐसे हैं जो देखने में अच्छा लगता है लेकिन नुकसानप्रद हैं । पाँच इन्द्रियाँ आपको काम में लगाकर रखता है। चार कषायों में सबसे भारी लोभ है। बहुत सी प्रवृत्ति लोभ से प्रेरित होकर करते हैं। लोभ किसी को भी फंसा लेता है। एक बार जिसमें सुख की अनुभूति हुई, उसे बार-बार चाहना, जरूरत से ज्यादा चाहने की इच्छा भी लोभ है। लोभ से भी प्रमाद उत्पन्न होता है। ” उक्त उद्गार श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ नगपुरा में प्रवचन श्रृंखला में चातुर्मासार्थ विराजित श्री प्रशमरति विजय जी म. सा. (देवर्धि साहेब ) ने श्री आचारांग सूत्र की व्याख्या करते हुए व्यक्त किए।
पूज्य श्री देवर्धि साहेब ने कहा कि लोभ का सामान्य अर्थ में प्रयोग हम धन के लिए ही करते हैं। बोलचाल में कहते हैं कि अमुक व्यक्ति पैसा का लोभी है। यथार्थ में लोभ पाँच जगहों से जुड़ा हुआ है। स्पर्श-रस-गंध-रूप और शब्द में भी लोभ होता है। स्पर्श करने से भी लोभ होता है। जहाँ स्वाद है वहाँ भी लोभ होता है। सुगंध लेने का लोभ होता है। किसी दृश्य को या किसी स्थान को बार-बार देखना भी लोभ है। गीत-संगीत को बार-बार श्रवण करना भी लोभ है। स्पर्श, रस, गंध, रुप और शब्द का पुनरावर्तन लोभ है, ! लोभ कम नहीं होगा तो अंतिम समय में आर्त्तध्यान होना ही है। मौत की पीड़ा से बढ़कर लोभ की पीड़ा का अहसास होगा। जीवनपर्यंत पाँच इन्द्रियों के माध्यम से जो लोभ का आकर्षण बना रहता है , वह अंतिम समय आर्त्तध्यान का माध्यम बन जाता है। अपनी आँखों को क्या दिखाना,क्या नहीं दिखाना यह आपके हाथ में है। सत्तर, अस्सी साल पूर्व हम समंदर, पहाड़ी, जलप्रपात, नदियों के संगम, उद्यान, महल, दुर्ग देखने घर से निकलते थे। जो आदमी घर के नहीं हैं और घर के हित में नहीं है ,उन्हें घर में न देखा जाता था, न सुना जाता था। ऐसा होने के कारण हमें जो दिखता था ,वो सब हमारे मन को अधिक नुकसान नहीं करता था, लेकिन जब से टी. वी. जैसे दृश्य माध्यम ने घर में जगह बनाई है तब से पूरी दुनिया जैसे घर में आकर बस गयी है। हम जिन लोगों के बिना जी सकते हैं, उन लोगों को देखने की जैसे आदत लग गई है, हमें। जिसे हम देखते हैं ,उसकी तरह होने का हम सोचने लगते हैं और उसी का अनुकरण करने का मन करता है। भगवान की मूर्ति को देखोगे तो भगवान होने का मन होता रहेगा। आप गुरू की प्रतिकृति को देखोगे ,तो गुरू जैसा जीवन जीने का मन होगा मगर आप दृश्य माध्यम से अनुचित दृश्य देखते रहेंगे तो आपका मन उसी दृश्य की छाया में विचार करने लगेगा और विचारधारा बनाने लगेगा। आप तय कर लो कि आपको क्या नहीं देखना है। आप स्वयं को दृश्य माध्यम से जितना बचाके रखेंगे उतना ही अशुभ विचारों से बच पाओगे।शुभ विचार से संस्कार का सृजन होता हैं ! संस्कार साथ में जाता है, सपना यहीं रुक जाता है। अपने आपको पूछते रहें किन-किन लोभ से जुड़े हैं। जो पूछता है, उसे उत्तर मिलता है।