एक मैदान, दो कूड़ेदान और कुछ किशोर छात्राएं
एक मैदान, दो कूड़ेदान और कुछ किशोर छात्राएं। किसी ने नहीं सोचा होगा कि ऐसे शुरू हुआ खेल एक दिन दुनिया के सबसे बड़े मंच ‘ओलिंपिक’ तक पहुंचने का सपना देखेगा। आज नेटबॉल को अक्सर ‘लड़कियों का खेल’ कहकर नजरअंदाज किया जाता है, लेकिन इसकी कहानी बताती है कि यह खेल सिर्फ गेंद और गोल की नहीं, बल्कि महिलाओं की आजादी, आत्मविश्वास और बराबरी की लड़ाई की भी कहानी है।
1895 में इंग्लैंड के डार्टफोर्ड में मार्टिना बर्गमैन ओस्टरबर्ग नाम की एक शिक्षाविद ने अपने फिजिकल ट्रेनिंग कॉलेज में छात्राओं को नया खेल खिलाना शुरू किया। यह खेल अमेरिका में 1891 में बने बास्केटबॉल से प्रेरित था, लेकिन इसे महिलाओं के लिए नए नियमों के साथ तैयार किया गया। शुरुआत में गेंद कूड़ेदानों में डाली जाती थी। बाद में रिंग लगी, ड्रिब्लिंग खत्म हुई और खेल का नाम पड़ा- नेटबॉल।
लेकिन यह सिर्फ खेल का जन्म नहीं था। उस दौर में महिलाओं के लिए खेलना भी सामाजिक नियमों के खिलाफ माना जाता था। उनसे उम्मीद की जाती थी कि वे घर संभालें, कॉर्सेट पहनें और सीमित जीवन जिएं। ओस्टरबर्ग ने इन धारणाओं को चुनौती दी। उन्होंने अपने कॉलेज में छात्राओं को शरीर विज्ञान, स्वास्थ्य, व्यायाम और नेतृत्व की शिक्षा दी गई। उनका मानना था कि मजबूत शरीर और आत्मविश्वास से ही मजबूत समाज बनता है।
1901 में नेटबॉल के पहले आधिकारिक नियम बने। शुरुआत में यह
